Thanks for joining me!
Good company in a journey makes the way seem shorter. — Izaak Walton

India First, India always
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सुबह-सुबह पार्क में गुनगुनी धूप का आनंद लेते हुए समाचार पत्र पढ़ रहा था, जिसमें एक नामी विद्वान का लेख छपा था कि भारतीय दंड सहिंता की धारा 124 गैर-लोकतान्त्रिक और औपनिवेशिक है क्योंकि यह अभिव्यक्ति की आज़ादी पर हमला करती है. ख़ैर इसी बीच मेरी नज़रे सामने बैठे एक प्रेमी युगल पर जाकर ठहर गई, वह दोनों अपने प्रेम की चर्चा और क्रीडाओं में डूबे थे. न जाने लोग कैसे देख रहे थे और क्या सोच रहे थे, इसी बीच एक आवाज़ आई.शायद कोई बुज़ुर्ग व्यक्ति था, दोनों प्रेमियों ने उस चिल्लाते हुए शख्स की ओर देखा और फिर एक-दूसरे को देखा. वह बुज़ुर्ग आगे आया और तिरछी आंखे करके बोला, यह क्या चल रहा है? यह तुम्हारा घर नहीं, गार्डन है. शायद लड़की ने हाल ही में फेडरिक एंजेल को पढ़ा था और पक्की फेमिनिस्ट हो चुकी थी, इसी कारण बुज़ुर्ग की और गुस्से से देखते हुए बोली- हम जानते हैं किन्तु आप नहीं जानते हैं कि यह सार्वजानिक गार्डन है न कि आपका निज़ी गार्डन.
इतना सुनकर बुज़ुर्ग ने बुड्ढ़े वाला रूप धारण कर लिया और गरज़ते हुए बोला तो क्या कुछ भी करोगे? अब तक शांत खड़े लड़के के अंदर का आन्दोलनकारी जाग चुका था, बड़ा अनुभवी लड़का था कई सालों से एक प्रसिद्ध विश्वविद्यालय में कई आंदोलन कर रहा था और अभिव्यक्ति की आज़ादी विषय से पीएचडी भी कर रहा था. वह बोला देखिए यह लोकतंत्र है, कोई किसी संघ का कार्यालय नहीं है. हम आज़ादी लेकर रहेंगे और आपकी असहिष्णुता का जमकर विरोध करेंगे.
शरद में ज्येष्ठ सी गर्मी बढ़ते देख किसी ने पुलिस को सूचित कर दिया. अब तक लड़के ने व्हाट्स एप्प से क्रांति पैदा कर दी थी और बहुत से युवकों और युवतियों का पोस्टर, बैनर और झंडो के साथ आगमन हो चुका था. अब बुज़ुर्ग के पक्ष में भी कुछ लोग आ गए और दोनों तरफ से शोर मचने लगा. इसी बीच लड़की ने लड़के से बोला- बेबी मुझे डर लग रहा है , अब यह जगह रहने लायक नहीं रही है, बहुत इनटोलरैंस हो चुकी है. इसी इनटोलरैंस के बीच पुलिस भी पहुँच गई तथा पूरा मामला जानने की कोशिश करने लगी.
इसी बीच मुखरता से प्रेमी युगल और उनके साथियों ने कहा कि यदि हमने कुछ गलत नहीं किया है और हम तो शांतिपूर्ण ढंग से चर्चा कर रहे थे. यदि हमने कुछ गलत किया है तो सबूत दिखाओं क्योंकि यह बैठकर चर्चा करना कोई अपराध नहीं, अभिव्यक्ति की आज़ादी है. पुलिस बुज़ुर्ग की ओर देखा कहा सबूत दो. उसने कहा कैसे दूँ? मेरे पास तो सबूत ही नहीं है. मैंने तो रिकॉर्ड ही नहीं किया क्योंकि मुझे लगा गलत रोकना जरुरी है, समझाना जरूरी है, न कि सबूत जुटाना.
इसी बीच समझदार और बुद्धिजीवी के रूप में प्रमाणित एक अधेड़ से व्यक्ति ने बुज़ुर्ग को फटकार लगाई और कहा कि ख़बरदार यदि आगे से अभिव्यक्ति की आज़ादी पर कोई प्रश्न चिन्ह लगाया तो कड़ी कार्यवाही का सामना करना पड़ेगा. बुज़ुर्ग अगल-बगल झाकते हुए निकल गया और युवकों और युवतियों ने शाम को मोमबत्तियों का मार्च निकलकर अभिव्यक्ति की आज़ादी पर हुए हमले का विरोध करना तय किया तथा सभी युवक और युवती अलग-अलग कोने पकड़कर अपनें प्रेम की अभिव्यक्ति में डूब गए. इस घटनाक्रम के बीच मैंने आलेख भी पढ़ लिया कि अभिव्यक्ति की आज़ादी क्यों जरूरी है…..